गुमला

जनजाति की छाती पर विकास का तांडव, बोले संतोष झा

प्रयास मंच गुमला के अध्यक्ष संतोष झा ने कहा है कि विश्व में औद्योगिक क्रांति के बाद से ही विकास, विकास- विकास की होड़ मची है. विकास की पहली शर्त है. सस्ती और कम परेशानी में मिलने वाला बड़ा भूखंड. नजदीक से प्राप्त होने वाला बड़ा जल भंडार. उद्योग में प्रयुक्त होने वाला कच्चा माल. बिजली की सुलभ आपूर्ति. रेल एवं सड़क यातायात तथा सस्ते मजदूर की उपलब्धता. इन सभी उपलब्धताओं के बिना उद्योग स्थापना संभव नहीं और इन सभी आवश्यक शर्तों के लिए बहुत बड़ी मात्रा में भूखंड की आवश्यकता है.

इसी भूखंड प्राप्ति के लिए अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, पेरू, कोलंबिया, रूस आदि विश्व के सभी देशों में क्रमिक हिंसक प्रक्रिया के द्वारा लाखों लाख लोगों का संघार हुआ. जबरन विस्थापन, संस्कृति दमन और यह सब सिर्फ औद्योगिकरण के लिए खनिज दोहन एवं अन्य आधारभूत प्रक्रियाओं के लिए हुआ जो आज भी सूडान में सोने के खान के लिए क्रूर हत्याएं जारी हैं. इससे भारत भी अछूता नहीं है. सभी प्रकार के खनिज तत्व पहाड़ों जंगली क्षेत्र आदि में पाए जाते हैं. इसलिए माइनिंग के नाम पर भूमि अधिग्रहण माइनिंग क्षेत्र तक पहुंच सड़क रेल बनाने के लिए अधिग्रहण उद्योग में जल आपूर्ति हेतु बाँध के नाम पर अधिग्रहण पावर प्लांट के नाम पर अधिग्रहण औद्योगिक इकाई के लिए अधिग्रहण और अंत में इन सभी संचालक के लिए आए  अप्रवासियों के लिए शहरीकरण हेतु अधिग्रहण इस अधिग्रहण-अधिग्रहण के खेल ने अमूल्य बाप दादा की छोड़ी विरासत में मिली जमीन संस्कृति संस्कार मान- सम्मान चंद कागज के नोटों के बदले सरकार के एक फरमान से छीन ली जाती है और मिलता है प्रदूषण. जनित रोग भुखमरी भूमिहीनता का दंश औद्योगिक क्षेत्र घोषित होते ही जमीन के दाम आसमान छूने लगते हैं. मुआवजा से मिली रकम आसपास के क्षेत्र में दो गज जमीन खरीदने के लायक भी नहीं रह जाती. तब शुरू होता है. पलायन झुग्गी झोपड़ी का निर्माण एक संपन्न किसान बन जाता है.

रिफ्यूजी कहीं सरकारी जमीन पर तो कहीं रेलवे लाइन के किनारे तो कहीं जंगलों में सर छुपाने के लिए अस्त-व्यस्त जीवन के साथ बनने लगती है. झोपड़ियां फिर एक दिन कोर्ट के आदेश की आड़ में वही अप्रवासी जिनके लिए इन्होंने घर बार छोड़ पलायन किया था. पुलिस पदाधिकारी के रूप में इन्हीं के जमीन पर बसे शहर को बदसूरत बनाने वाला बता कर चलवाते हैं. बुलडोजर और पुलिस की लाठियां तो फिर विकास किसका हुआ. चंद होशियार लोगों का जो अपने फायदे के लिए वंश परंपरा संस्कृति उजाड़ना जानते हैं. जिनके दिमाग खातिर हैं खुद को संभ्रात बता कर दूसरों को मिटाना जानते हैं प्राचीन सभ्यताओं को मिटा कर असभ्यता फैलाना जानते हैं और अपने ऐसो आराम की जिंदगी के लिए गरीब मजलूमों को नौकर बनाना जानते हैं विश्व के लगभग सभी उन्नत देशों में खूनी क्रांति हो चुकी है. भारत देर से उन्नत हो रहा है. यहां भी क्रांति की आग सुलग रही है. पता नहीं कब खूनी क्रांति का रूप ले-लेगी. विकास जरूरी है पर इतनी नहीं की सब कुछ मिटा दे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *