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300 साल पुरानी है गुमला के उर्मी रथयात्रा मेले की परंपरा, जानिए इसकी अनोखी कहानी

गुमला के उर्मी गांव में रथयात्रा मेला लगाने का इतिहास 300 साल पुराना है. उर्मी पहाड़ में भगवान की मंदिर है. जहां हर साल मेला लगता है और आसपास के सैंकड़ों गांव के लोग यहां पूजा करने आते हैं. उर्मी गांव में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा की पूजा के पीछे गांव की खुशहाली की कहानी छिपी हुई है. 300 साल पहले अरमई गढ़ में भगवान की पूजा होती थी. परंतु, डोमन सिंह (अब स्वर्गीय) ने अरमई गढ़ से भगवान की प्रतिमाओं को उठाकर उर्मी गांव ले आये और एक झोपड़ीनुमा घर में भगवान को स्थापित कर दिये. तब से उर्मी गांव में भगवान की पूजा शुरू होने लगी.

बाद में यहां मेला लगने लगा और रथयात्रा की परंपरा शुरू हुई जो अब भी अनवरत जारी है. इस वर्ष 16 जुलाई को मेला है. मेला की पूरी तैयारी हो गयी है. कई प्रकार के झूले लगे हैं. संदीप प्रसाद व अनमोल गुप्ता ने कहा है कि मंदिर की साफ सफाई व रंगाई पुताई का काम हो गया है. मेला में हजारों लोग भाग लेंगे. जिस पहाड़ पर मेला है. उस पहाड़ के सुंदरीकरण की जरूरत है. यहां श्रद्धालुओं के बैठने के लिए शेड, सीमेंट की कुर्सी व सोलर लाइट की व्यवस्था हो. चूंकि यह प्राचीन मंदिर है. यहां से लोगों की श्रद्धा जुड़ी हुई है. कई अवसरों पर यहां कार्यक्रम भी होता है. मंदिर ठीक उर्मी बाइपास से सटा हुआ है. इस कारण पहाड़‍ व मंदिर का सुंदरीकरण पर्यटन विभाग से किया जाये.

चौकीदार कृष्णा सिंह ने कहा

उर्मी गांव के चौकीदार कृष्णा सिंह ने बताया कि करीब 300 साल पहले उनके परदादा स्व डोमन सिंह ने अरमई से भगवान के विग्रह को उर्मी गांव लेकर आये थे. इसके बाद यहां एक खपैड़ल घर को ही मंदिर को रूप देकर पूजा शुरू की गयी. जबकि मौसीबाड़ा हमारे घर को उस समय बनाया गया था. बाद में मेरे दादा स्वर्गीय जगदेव सिंह व पिता चौकीदार भीखम सिंह ने पूजा शुरू की. कृष्णा सिंह ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने उर्मी में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा की पूजा की परंपरा शुरू की थी. रथयात्रा मेला लगाने की भी प्राचीन परंपरा की शुरूआत हुई. आज भी यह रथयात्रा मेला लग रहा है. इस मेले में सैंकड़ों गांव के लोग आते हैं.

पुजारी शिवराज पांडे ने कहा

मंदिर के मुख्य पुजारी शिवराज पांडे ने बताया कि मैं उर्मी स्थित जगन्नाथ प्रभु के मंदिर में 2003 से पूजा करा रहा हूं. इससे पहले राजेश्वर पांडे पूजा कराते थे. राजेश्वर पांडे के निधन के बाद से पूजा कराने की जिम्मेवारी मुझे मिली है. तब से मैं यहां पूजा कराते आ रहा हूं. उन्होंने कहा कि उर्मी पहाड़‍ में मंदिर निर्माण की रोचक कहानी है. पहाड़ के ऊपर 1995 में मंदिर का निर्माण हुआ. इसके बाद गांव से भगवान को लाकर पहाड़ स्थित मंदिर में स्थापित की गयी. जो 300 साल पुराना खपैड़ल मंदिर था. उसे मौसीबाड़ी बना दिया गया. अब पहाड़ स्थित मंदिर से उतरकर भगवान गांव स्थित पुराने मंदिर जो वर्तमान में मौसीबाड़ी है. वहां जाते हैं और नौ दिनों के बाद वापस लौट जाते हैं.

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