गुमला

Adivasi Ulgulan Maharally : कुड़मी समाज राजनीतिक दबाव बनाकर आदिवासी बनना चाहते हैं, बोले देवकुमार धान

Adivasi Ulgulan Maharally : कुड़मी-कुर्मी समुदाय द्वारा अनुसूचति जनजाति (एसटी) में शामिल होने की मांग के विरोध में शुक्रवार को गुमला में आदिवासी उलगुलान महारैली का आयोजन किया गया. आदिवासी छात्र संघ, राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा भारत सहित विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा आयोजित महारैली में उरांव, मुंडा, बिरहोर, खड़िया, लोहरा, महली सहित आदिवासी समुदाय के 33 जनजातियों के सैकड़ों लोगों ने भाग लिया. महारैली में शामिल आदिवासी समुदाय के लोग तीर-धनूष, तलवार, भाला, गोईता सहित अन्य पारंपरिक हथियार व कुड़मी समुदाय के विरोध से संबंधित तख्तियां अपने हाथों में थामे हुए थे और आदिवासी एकता जिंदाबाद, एक तीर एक कमान, आदिवासी एकसमान, कुड़मी समुदाय को आदिवासी में शामिल नहीं होने देंगे, जो हमसे टकरायेगा, चूर-चूर हो जायेगा जैसे गगनभेदी नारा लगाते हुए चल रहे थे. वहीं महारैली के बाद परमवीर अलबर्ट एक्का स्टेडियम में जनसभा का आयोजन किया गया. जहां मुख्य वक्ता आदिवासी बचाओ मोरचा के संयोजक देवकुमार धान ने कहा कि कुड़मी समुदाय द्वारा खुद को आदिवासी में शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है. जिसका हम पूरजोर विरोध करते हैं.

उन्होंने कहा कि कुड़मी समुदाय ने 1929 में कुड़मी क्षत्रिय महासभा का गठन किया था और मुजफरपुर में जाकर खुद को शिवाजी महाराज का वंशज व लव-कुश को अपना पूर्वज बताकर जनैव धारण किया था. इसके बाद 1931 में इनलोगों ने दावा कि वे आदिवासी में शामिल थे. लेकिन ये कभी भी आदिवासी में शामिल नहीं थे. इसी आधार पर 2004 में झारखंड के पीआरआई के द्वारा इन्हें आदिवासी में शामिल करने की मांग को खारिज कर दिया गया. लेकिन आज राजनीतिक रूप से दबाव बनाकर ये आदिवासी बनना चाहते हैं. इनका आदिवासी में शामिल होने का मुख्य उद्देश्य विधायक, सांसद, मुखिया, जिप सदस्य व नौकरी में घुसना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि 2008 में हेमंत सोरेन ने झामुमो के सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किया था कि कुड़मी को आदिवासी बनायेंगे. इसके बाद राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास थे. तब उन्होंने 2018 में पत्र लिखा था कि कुड़मी को आदिवासी बनाया जाये. उन्होंने कहा कि अबुवा राज के मुखिया आज आदिवासी समुदाय के खिलाफ खड़ा है और भाजपा द्वारा मणिपुर में जिस प्रकार दो समुदाय को लड़ाकर राज कर रहा है. उसी प्रकार यहां भी भाजपा आदिवासी व कुड़मी को लड़ाकर राज करना चाहता है. उन्होंने कहा कि आदिवासी भाईयों को एकजुट रहने का समय है. यदि बटेंगे तो कटेंगे. चूंकि झारखंड 15 नवंबर को 25 साल का युवा झारखंड बन रहा है. लेकिन आज भी यहां स्थानीय समस्याएं हैं. लोग जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं. गुमला में मंत्री और विधायक हैं. लेकिन आदिवासी के विकास के लिए 95 प्रतिशत राशि का कहीं और खर्च किया जा रहा है. यहां पेशा कानून लागू नहीं हो पाया. आदिवासी समुदाय के लोगों को इस बात को समझने की जरूरत है. सभा को अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया.

कुड़मी समाज हमारे धर्म में घुसपैठ करने की कोशिश कर रही है : जगरनाथ उरांव

समाजसेवी जगरनाथ उरांव ने एक तीर एक कमान, आदिवासी एकसमान का नारा लगाते हुए कहा कि सभी अपने-अपने धर्म के प्रति कट्टर रहते हैं. हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं. लेकिन अपने धर्म के प्रति हम भी कट्टर हैं. पहले आप सोचें कि हम आदिवासी हैं. इसके बाद कुछ और सोचें. उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कुड़मी समाज द्वारा हमारे धर्म में घुसपैठ करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन हम उनकी हर कोशिश को नाकाम कर देंगे. शुरू से ही हमारा समाज कई प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है. हमारे सामने अनेकों परेशानियां है. इसलिए हमें एकजूट रहकर लड़ाई लड़ने की जरूरत है. हम आदिवासियों की पहले से ही जरूरतें पूरी नहीं हो रही है और अब हमें और लूटने का प्रयास किया जा रहा है. झारखंड राज्य में आदिवासी समुदाय के 33 जनजातियां है और 33 जनजातियां ही रहेगी. इसमें 34 नहीं होने देंगे.

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