Gumla : आठ साल बाद मिला न्याय, दुष्कर्म मामले में दोषी को सात साल की सजा
Gumla : गुमला जिले के पालकोट थाना क्षेत्र में वर्ष 2017 में हुए चर्चित दुष्कर्म मामले में आखिरकार न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया. अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-1 प्रेम शंकर की अदालत ने आरोपी पीयूष तिर्की को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनायी है. साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. जुर्माना अदा नहीं करने पर दोषी को छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतनी होगी. यह मामला पालकोट थाना कांड संख्या 72/17 और चिल्ड्रेन केस संख्या 2/19 के रूप में दर्ज था.
घटना 23 अक्तूबर 2017 की है. जबकि मामला 24 अक्तूबर को प्रकाश में आया था. नाबालिग पीड़िता की मां ने थाना में लिखित आवेदन देकर बताया था कि दोपहर के समय उसकी बेटी घर में सो रही थी. इसी दौरान देवगांव बड़कोटोली निवासी पीयूष तिर्की घर में घुस आया. दरवाजा अंदर से बंद नहीं होने का फायदा उठाकर वह कमरे में प्रवेश कर गया और कथित तौर पर पीड़िता का मुंह कपड़े से बांधकर उसके साथ जबरन दुष्कर्म किया. शिकायत में यह भी कहा गया था कि घटना के बाद आरोपी ने जान से मारने की धमकी दी. जिससे परिवार भयभीत हो गया. पहले मामले को पंचायत में उठाया गया. लेकिन आरोपी ने आरोपों से इनकार कर दिया और किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया. इसके बाद पीड़िता की मां ने विधिवत थाना में आवेदन देकर कानूनी कार्रवाई की मांग की.
पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की. पीड़िता का बयान दर्ज किया गया और चिकित्सीय परीक्षण कराया गया. जांच में जुटाये गये साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र अदालत में दाखिल किया. सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कई महत्वपूर्ण गवाह पेश किये और घटनाक्रम से जुड़े साक्ष्य अदालत के समक्ष रखे. बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि आरोप प्रमाणित होते हैं.
फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि नाबालिग के साथ किया गया अपराध गंभीर प्रकृति का है और ऐसे मामलों में कठोर दंड आवश्यक है. ताकि समाज में कानून के प्रति विश्वास बना रहे. सजा के साथ लगाया गया जुर्माना पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में एक औपचारिक कदम माना जा रहा है. करीब आठ वर्षों तक चले इस मुकदमे के बाद आये फैसले से पीड़िता के परिवार ने राहत की सांस ली है. वहीं, स्थानीय लोगों का मानना है कि यह निर्णय समाज में स्पष्ट संदेश देता है कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध करने वालों को अंततः कानून के कठघरे में खड़ा होना ही पड़ता है.
