Mahashivratri : गुमला में चारों ओर शिव ही शिव
Mahashivratri : झारखंड राज्य का पहला जिला गुमला है. जहां चारों ओर शिवमंदिर व शिवलिंग है. जिस प्रखंड, पंचायत व गांव में पहुंच जाये. वहां जरूर शिव मंदिर व शिवलिंग है. यहां कई प्राचीन मंदिर भी हैं. कई शिवलिंग है. जिसका इतिहास रामायण व महाभारत युग से है. सातवीं व आठवीं शताब्दी के भी मंदिर व शिवलिंग है. गुमला के अधिकांश लोग जो जंगल व पहाड़ों में रहते हैं. अपने को शिव का सबसे बड़ा भक्त मानते हैं. यही वजह है महाशिवरात्रि में यहां शिव की पूजा पूरे उत्साह के साथ होता है. महाशिवरात्रि में शिव मंदिर व शिवलिंगों में पूजा के लिए भक्तों की भीड़ हर जगह देखी जाती है. गुमला के प्रमुख शिवमंदिर व शिवलिंगों में टांगीनाथ धाम, देवाकीधाम, बुढ़वा महादेव मंदिर करमटोली, वासुदेव कोना, देवगांव गुफा, पहाड़गांव, सेरका शिवलिंग के अलावा कई मंदिर है. 15 फरवरी को महाशिवरात्रि है. सभी शिवालयों में पूजा की तैयार कर ली गयी है. मंदिरों व शिवालयों को आकर्षक तरीके से सजाया गया है.
देवाकीधाम : श्रीकृष्ण की मां देवकी के नाम पर है मंदिर
घाघरा प्रखंड से तीन किमी दूर केराझारिया नदी के तट देवाकी बाबाधाम मंदिर है. यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. जनश्रुति के अनुसार महाभारत काल में पांडव के अज्ञातवाश के समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पांच शिवलिंग की स्थापना की गयी थी. इसमें से एक शिवलिंग देवाकाधाम में है. इसलिए इस स्थल का नाम श्रीकृष्ण की मां देवकी के नाम पर देवाकीधाम पड़ा. पांडवों के अज्ञातवाश के समाप्ति के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने देवाकीधाम में ही शंख बजाये थे.
देवगांव : पहाड़ की गुफा में स्वयं भगवान शिव बसते हैं
पालकोट में देवगांव है. यहां पहाड़ की गुफा में मंदिर है, जो काफी प्राचीन है.गुमला व सिमडेगा मार्ग में पड़ने के कारण यह इलाका बिहार, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, बंगाल व झारखंड राज्य के श्रद्धालू आते हैं. पालकोट के पहाड़ में भी सावन माह में भक्तों की भीड़ उमड़ती है. ओड़िशा राज्य से भक्त काफी संख्या में आते हैं. देवगांव में भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है. इसके अलावा बाबा बूढ़ा महादेव मंदिर सहित कई प्रमुख स्थल है.
टांगीनाथ धाम देवकाल की कहानी बयां करती
डुमरी प्रखंड के टांगीनाथ धाम में कई राज्यों से शिवभक्त जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. यहां कई पुरातात्विक व ऐतिहासिक धरोहर है, जो आज भी साक्षात है. यहां की कलाकृतियां व नक्कासी, देवकाल की कहानी बयां करती है. साथ है कई ऐसे स्रोत हैं, जो 7वीं व 9वीं शताब्दी में ले जाता है. टांगीनाथ धाम में यत्र तत्र सैंकड़ों की संख्या में शिवलिंग है. यह मंदिर शाश्वत है. जमीन के ऊपर स्थित त्रिशूल के अग्र भाग में कभी जंग नहीं लगता है.
वासुदेव कोना : यहां प्राचीन मंदिर है, आस्था जुड़ी है
रायडीह प्रखंड में वासुदेव कोना मंदिर है. यह प्राचीन मंदिर है. इस मंदिर से अंग्रेजी हुकूमत की लड़ाई का इतिहास भी छिपा हुआ है. यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है. स्थानीय लोगों के अलावा छत्तीसगढ़ व ओड़िशा राज्य के लोगों का इस मंदिर से विश्वास व आस्था जुड़ी हुई है. यहां दिल से मांगी गयी मुराद पूरी होती है. इसलिए यहां भक्त दूर-दूर से पूजा करने आते हैं.
सेरका शिवलिंग : हर छह माह में बदलता है रंग
बिशुनपुर मुख्यालय से सटे सेरका गांव स्थित अति प्राचीन शिवालय मंदिर लोगों के लिए आस्था का केंद्र है. मंदिर में खासियत यह है कि नागेश्वर नाथ एवं दूधेश्वर नाथ दो शिवलिंग है. जिनका साल में दो बार रंग बदल जाता है. कभी वह लाल हो जाता है तो कभी सफेद. जिस कारण लोगों का अटूट आस्था इस शिवालय से है. भक्ति व श्रद्धा यहां देखने को मिलता है.
