शाम 4 बजते ही सूनी हो जाती थीं गुमला की सड़कें, वजह था फुटबॉल का जुनून
गुमला के वरिष्ठ पत्रकार विजय आनंद ने करीब 30 साल पहले और आज के फुटबॉल के दौर की यादें साझा की हैं. उन्होंने बताया कि एक समय गुमला में फुटबॉल को लेकर लोगों में जबरदस्त जुनून था. शाम के चार बजते ही शहर की कई सड़कें सुनसान हो जाती थीं, क्योंकि लोग फुटबॉल मैच देखने मैदान पहुंच जाते थे. शहर के अलावा आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में दर्शक मैच देखने आते थे. मैच के दौरान मैदान में खूब भीड़ जुटती थी. उस समय स्कूल के बच्चों में भी फुटबॉल को लेकर खासा उत्साह रहता था. गुमला में फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं, बल्कि लोगों के बीच उत्साह और जुनून का हिस्सा था.
एसएस हाई स्कूल और संत इग्नासियुस हाई स्कूल के विद्यार्थियों के बीच अक्सर मैत्री फुटबॉल मैच हुआ करते थे. एसएस स्कूल का एक कर्मचारी बोरे में कई फुटबॉल लेकर शाम करीब चार बजे मैदान पहुंचता था. इसके बाद छात्र गेंद निकालते और अपनी-अपनी टीमें बनाकर खेलने लगते थे. उस समय मैदान काफी बड़ा हुआ करता था. आज उसी जगह पर स्टेडियम बन चुका है. संत इग्नासियुस हाई स्कूल के खिलाड़ियों ने भी कड़ी मेहनत और लगन से फुटबॉल खेला. आगे चलकर इन खिलाड़ियों ने गुमला का नाम रोशन किया और फुटबॉल के इतिहास में अपनी खास पहचान बनाई.
विद्यालय की टीम ने प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सुब्रतो कप का खिताब दो बार अपने नाम किया. यह उस समय की बात है, जब गुमला अविभाजित बिहार का हिस्सा था. 70 और 80 के दशक में गुमला में फुटबॉल का क्रेज चरम पर था. स्थानीय स्तर पर लोहरदगा, सिमडेगा और रांची की टीमें यहां आती थीं. धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों का आयोजन भी शुरू हुआ. कोलकाता, आसनसोल, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा और राउरकेला सहित कई स्थानों की टीमें गुमला पहुंचने लगीं. राज्य और केंद्र सरकार के सहयोग से यहां दो बार अखिल भारतीय खेलकूद प्रतियोगिता का भी आयोजन हुआ. इसी दौर में गुमला को ‘खेल नगरी’ के रूप में पहचान मिलने लगी. समय बदला और फुटबॉल व हॉकी के प्रति वह पुराना जुनून कुछ कम हुआ. क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ी. हालांकि विशेष अवसरों पर मैत्री मैच आज भी होते हैं और स्टेडियम में खिलाड़ियों का अभ्यास जारी है.
झारखंड बनने के बाद खेल के क्षेत्र में गुमला की बेटियों ने नई पहचान बनायी. फुटबॉल और हॉकी में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये. आज पहले की तुलना में खेल सुविधाएं बेहतर हुई हैं. झारखंड सरकार ने यहां खेल प्रशिक्षण के लिए सेंटर भी शुरू किया है. हॉकी को गुमला के सबसे पुराने खेलों में माना जाता है. पहले लड़कियों की खेल गतिविधियां सीमित थीं. लेकिन झारखंड गठन के बाद बेटियों ने खेल के मैदान में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करायी. संत पात्रिक स्कूल की छात्राओं ने राष्ट्रीय स्तर पर दो बार सुब्रतो कप का खिताब जीतकर गुमला का नाम रोशन किया. वहीं अष्टमी उरांव जैसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी का राष्ट्रीय टीम में चयन और एशिया कप के लिए जगह बनाना इस बदलाव की बड़ी मिसाल है. कभी जिन मैदानों में फुटबॉल के जुनून से शहर की रफ्तार थम जाती थी, वहीं आज गुमला की बेटियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं. यही बदलते गुमला की खेल यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है.
