मांदर को GI टैग, गुमला के जरजट्टा के कारीगरों में खुशी
झारखंड की आदिवासी संस्कृति और लोकजीवन की पहचान मांदर को GI टैग मिलने से रायडीह प्रखंड में खुशी की लहर है. पांच वर्षों के प्रयास के बाद मिली इस आधिकारिक पहचान से पारंपरिक कारीगरों और कलाकारों को अपनी कला के व्यापक बाजार तक पहुंचने की उम्मीद जगी है. रायडीह के जरजट्टा गांव के मांदर कारीगर इसे अपनी पुश्तैनी कला का सम्मान मान रहे हैं. मांदर झारखंड के आदिवासी समाज के पर्व-त्योहारों, पारंपरिक नृत्य, लोकगीत और सामाजिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा है. इसकी थाप पर पीढ़ियों से लोकगीत और नृत्य की परंपरा आगे बढ़ती रही है. GI टैग मिलने से इसकी विशिष्ट पहचान को औपचारिक मान्यता मिली है.
जरजट्टा में कई परिवार पीढ़ियों से मांदर बनाने की कला को संजोए हुए हैं. कारीगर पारंपरिक तकनीक और अनुभव के आधार पर मांदर तैयार करते हैं. GI टैग मिलने की खबर से उनमें खासा उत्साह है. उनका कहना है कि अब उनकी कला को देशभर में पहचान मिलने के साथ मांदर की मांग बढ़ सकती है. इससे कारीगर परिवारों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं. आधुनिक दौर में पारंपरिक कला के सामने बाजार और रोजगार की चुनौतियां हैं. कारीगरों को उम्मीद है कि GI पहचान से मांदर को व्यापक बाजार मिलेगा और नई पीढ़ी भी इस पुश्तैनी कला से जुड़ेगी.
स्थानीय लोगों के अनुसार, मांदर सिर्फ वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की मिट्टी, संस्कृति और सामुदायिक जीवन की पहचान है. GI टैग मिलने से रायडीह और गुमला की इस पारंपरिक कला को राष्ट्रीय स्तर पर नया मंच मिलने की उम्मीद है. जरजट्टा के कारीगरों ने इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी जताया है.
