गुमला

कोरोना लॉकडाउन तोड़कर फरार हुआ युवक छह साल बाद चढ़ा पुलिस के हत्थे, वारंटी को भेजा गया जेल

कोरोना महामारी के दौरान लागू लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का उल्लंघन कर फरार हुए एक वारंटी को आखिरकार गुमला पुलिस ने छह साल बाद गिरफ्तार कर लिया. लंबे समय से पुलिस और न्यायालय की नजरों से बचता फिर रहा आरोपी अब सलाखों के पीछे पहुंच गया है. गिरफ्तारी के बाद उसे मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी गुमला के न्यायालय में प्रस्तुत किया गया. जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. गिरफ्तार आरोपी की पहचान सूरज बिलुंग उर्फ सूरज खड़िया (26 वर्ष) के रूप में हुई है. वह गुमला शहर के बड़ाइक मोहल्ला का रहने वाला है. उसके खिलाफ गुमला थाना कांड संख्या 156/2020, जीआर संख्या 313/20 के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 269 और 188 में मामला दर्ज था.

जब पूरा देश लॉकडाउन में था, तब सड़क पर दौड़ा रहे थे स्कूटी

घटना कोरोना महामारी के सबसे संवेदनशील दौर की है. अप्रैल 2020 में देश और राज्य में सख्त लॉकडाउन लागू था. प्रशासन लगातार लोगों से घरों में रहने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील कर रहा था. इसी दौरान 16 अप्रैल 2020 की रात गुमला थाना में पदस्थापित तत्कालीन सहायक अवर निरीक्षक मो इसहाक अंसारी पुलिस बल के साथ शहीद चौक (टावर चौक) में लॉकडाउन पालन की निगरानी कर रहे थे. रात्रि करीब 8.10 बजे पुलिस ने एक स्कूटी पर दो लोगों को सवार देखा. पूछताछ के दौरान ही दूसरी स्कूटी पर सवार दो युवकों को रोकने का प्रयास किया गया. लेकिन वे पुलिस को देखकर भाग निकले. पुलिस ने पीछा किया. लेकिन दोनों युवक स्कूटी सड़क पर छोड़कर अंधेरे का फायदा उठाते हुए फरार हो गये थे. लेकिन पहचान नहीं छिपा सके. पुलिस ने मौके से छोड़ी गयी स्कूटी को जब्त कर उसके पंजीकरण नंबर के आधार पर जांच शुरू की. जांच में फरार युवकों की पहचान आकाश कुमार उर्फ गोलू और सूरज बिलुंग उर्फ सूरज खड़िया के रूप में हुई. इसके बाद दोनों आरोपियों के खिलाफ लॉकडाउन उल्लंघन और महामारी फैलने की आशंका से संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गयी थी.

छह साल तक फरार चल रहा था

मामला दर्ज होने के बाद सूरज बिलुंग लगातार फरार चल रहा था. न्यायालय से उसके खिलाफ वारंट भी जारी किया गया था. पुलिस की नजर से बचते हुए वह वर्षों तक गिरफ्तारी से दूर रहा. आखिरकार गुमला पुलिस ने उसे दबोच लिया और न्यायालय में पेश किया. पुलिस द्वारा न्यायालय को भेजे गये अग्रसारण प्रतिवेदन में आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने का अनुरोध किया गया था. ताकि मामले की सुनवाई और विचारण की प्रक्रिया आगे बढ़ सके. न्यायालय के आदेश पर उसे जेल भेज दिया गया.

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