Video : मां बनने वाली थी बृंदावती, मगर गांव तक सड़क नहीं थी… गर्भवती को गेड़ुआ भार में ढोते रहे परिजन
गुमला जिले के रायडीह प्रखंड की कोब्जा पंचायत के राजस्व ग्राम रमजा के बेंदवाकोना गांव की यह तस्वीर सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है. अबुआ सरकार के अबुआ राज और जिला प्रशासन के गांव के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने के दावे के बीच एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों को गेड़ुआ भार का सहारा लेना पड़ा.
गांव के गणेश सिंह की पत्नी बृंदावती देवी (24) गर्भवती हैं. गांव तक एंबुलेंस पहुंचने लायक सड़क नहीं होने के कारण परिजनों और ग्रामीण उन्हें गेड़ुआ भार में बोहकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल चले. इसके बाद महिला को मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया, जहां से उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था हो सकी. सवाल यह है कि जब एक गर्भवती महिला को इलाज के लिए आज भी इस तरह ढोकर ले जाना पड़े, तो गांव के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचने के दावे आखिर किस हकीकत पर टिके हैं?
मुख्य सड़क तक पहुंचने के बाद परिजनों ने प्राइवेट गाड़ी किराये पर लिया और बृंदावती देवी को इलाज के लिए सदर अस्पताल गुमला ले गये. हैरानी की बात यह है कि आजादी के 80 साल बाद भी इस गांव के लोग सड़क, पानी, बिजली समेत अन्य बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. गांव के ब्रजनाथ सिंह कहते हैं कि यहां के लोगों का जीवन भगवान भरोसे चल रहा है. गांव में आज तक सड़क नहीं बन सकी है. सड़क नहीं होने के कारण गांव का विकास पूरी तरह प्रभावित है और ग्रामीण आज भी बदहाली झेलने को मजबूर हैं. सबसे बड़ी परेशानी तब होती है, जब गांव में कोई बीमार पड़ जाता है. सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस या कोई अन्य वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाता. ऐसे में मरीजों को खाट, गेड़ुआ भार या किसी अन्य साधन से पैदल मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है. सवाल यह है कि आजादी के 80 साल बाद भी ग्रामीणों को इलाज जैसी बुनियादी जरूरत के लिए ऐसी जिल्लत क्यों झेलनी पड़ रही है?
आजादी के 80 साल बाद भी बदहाल बेंदवाकोना
सिंह ने बताया कि बेंदवाकोना गांव की तस्वीर विकास के तमाम दावों को आईना दिखा रही है. गांव में सड़क नहीं होने के कारण आज भी ग्रामीणों को मरीजों और गर्भवती महिलाओं को गेड़ुआ भार में बोहकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है. यही नहीं, गांव के लोग शुद्ध पेयजल के लिए भी तरस रहे हैं. ग्रामीण डाड़ी-चुआं का पानी पीने को मजबूर हैं. गर्मी में डाड़ी-चुआं सूख जाने से पानी की भारी किल्लत हो जाती है, जबकि बरसात में इसका पानी गंदा हो जाता है. इसके बावजूद ग्रामीणों के पास इसे पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. बिजली की सुविधा भी गांव तक नहीं पहुंची है. नतीजतन, आज भी लोग ढिबरी के सहारे जीवन गुजार रहे हैं. रात अंधेरे में कटती है और बच्चे इसी ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
बार-बार गुहार, फिर भी नहीं बदली तस्वीर
ग्रामीण ब्रजनाथ सिंह ने बताया कि गांव में सड़क, पानी, बिजली समेत अन्य मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर कई बार विधायक, सांसद और प्रशासन से गुहार लगायी जा चुकी है. हर बार ग्रामीणों को उम्मीद रहती है कि अब गांव की तस्वीर बदलेगी, लेकिन उनकी गुहार आज तक सिर्फ गुहार बनकर रह गयी है. समस्या जस की तस है और ग्रामीण बदहाली में जीने को मजबूर हैं.
क्षेत्र के युवा समाजसेवी कमल किशोर पहान ने कहा कि क्षेत्र के गांवों का दुर्भाग्य ही है कि आज भी ये विकास से कोसों दूर हैं. ग्रामीण उम्मीद के साथ अपनी समस्याएं प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने रखते हैं, लेकिन उनकी परेशानी सुनने के बाद भी अनसुनी कर दी जाती है. उन्होंने प्रशासन से बेंदवाकोना गांव तक करीब दो किलोमीटर सड़क का जल्द निर्माण कराने, पेयजल संकट दूर करने के लिए जलमीनार लगाने और गांव में बिजली सेवा बहाल करने की मांग की है.
